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10 जनवरी 2009

मुझे दर्द दे इतना.....

मुझे दर्द दे इतना की मिटा सकूँ किसी का दर्द
ख़ुद के अश्कों पर हंस सकूँ पोंछ कर ग़मों की गर्द
मुझे दर्द दे इतना......

नहीं साहिल की तमन्ना, नहीं तूफान का ग़म
ख़ुद ही बन कर दर्द-ए-जिगर, बता सकूँ दर्दों का ग़म
होठों को न हंसने की क़सम दे कर मुस्कुरा दूँ?
कितना बड़ा है फरेब, कितना सर्द है दिल
मुझे दर्द दे इतना.....

नहीं तबस्सुम की तमन्ना, नहीं ग़मों का ग़म
लुटा दूँ जान, मिट सके जो किसी का ग़म
दिल की जलन से ऐ 'धीर', अपने अरमानों को जला दूँ?
कितना बड़ा है फरेब, कितना सर्द है दिल
मुझे दर्द दे इतना.....

4 जनवरी 2009

दिल मेरा

जल रहा है दिल मेरा ग़म-ए-जुदाई की आग में

लिख रहा हूँ यह ग़ज़ल मैं, तुझको तेरी याद में

ठहरता नहीं है दिल पहलू में मेरे

आजा, अब आ भी जा यारब,

कहाँ वह चैन, वह सकूँ कहाँ है?

तू तो आया है बा-मुश्किल ख्याल में

लिख रहा हूँ...........

दिल लगाना इतना आसाँ नही है

तुने इसको समझा है जितना

हाय रे हमसफ़र मेरे

तू तो इतना नादाँ नहीं है

रहम तो आए तुझे इस हाल में

लिख रहा हूँ...................

चाहे न समझो दिल की लगी को

रहम तो करना इतना तुम मुझ पर

तुरबत पर मेरी ऐ 'धीर' आकर

चश्म-ए-तर से कुछ गुल बिछाना

तुम तो आबाद रहो वीराने में

लिख रहा हूँ...............

6 नवंबर 2008

ग़ज़ल


तुम्हे सुर्ख रंग ही चाहिए, मेरे दिल का रंग ले लो
तुम्हे खेल कोई चाहिए, मेरे दिल से आज खेलो

हर हाल में रहा हूँ, ज़िन्दा रहूँगा यूँ ही
यहाँ राख ही रही है, यहाँ राख ही रहेगी
नहीं खौफ़ है क़हर का, शोले मिलें या शबनम
ग़र तुम्हे शराब चाहिए, अश्कों को मेरे पी लो
तुम्हे सुर्ख रंग ही चाहिए, मेरे दिल का रंग ले लो....

मुझे ग़म नहीं की मैंने, काँटों का साथ माँगा
जब नींद में बशर थे, रातों को मै क्यों जागा
मेरे लहू से रोशन, ये हिज़ाब है सहर का
इस रंग को चुरा कर, होठों को तुम सज़ा लो
तुम्हे सुर्ख रंग ही चाहिए, मेरे दिल का रंग ले लो....

1 नवंबर 2008

कुछ दूर तो चल कर देखें

मुमकिन है सफर हो आसाँ, कुछ दूर तो चल कर देखें
कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर

दो चार कदम हर रास्ता, पहले की तरह लगता है
शायद कुछ रास्ता बदले, कुछ दूर तो चल कर देखें
झूठा ही सही यह रिश्ता , मिलते ही रहें हम यूँ ही
हालात नहीं बदलेंगे, रिश्ते ही बदल कर देखें

सूरज की तपिश भी देखी, शोलों की कशिश भी देखी
अबके जो घटा ये छाये, बरसात में चल कर देखें
अब वक्त बचा है कितना, जो और लड़े दुनिया से
दुनिया की नसीहत पर भी, थोड़ा सा अमल कर देखें

मुमकिन है सफर हो आसाँ, कुछ दूर तो चल कर देखें

कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें

7 अक्टूबर 2008

बहार आती ही नहीं

मेरे जीवन में बहार आती ही नहीं
चश्म-ए-तर से बहारें नज़र आती ही नहीं
न जाने राज़ क्या है, दिले हालत क्या है?
मेरे जीवन में बहार आती ही नहीं

बहारें आज तलक़ मुझसे ख़फा क्यों हैं
उनकी आंखों के सागर में नशा क्यों है
मुझे अब ज़िन्दगी जाने क्यों रुलाती ही नहीं
हंस पाता हूँ और अश्कों को बहा पता ही नहीं
मेरे जीवन में बहार आती ही नहीं

महफिल-ए-गुल में, काँटों की ज़रूरत क्या है
उनकी साँसों में खुशबू की ज़रूरत क्या है
दीवानों को शम्मा, जाने क्यों जलाती ही नहीं
जाम लबरेज़ हैं, होठों से लगाता ही नहीं
मेरे जीवन में बहार आती ही नहीं

किसी मायूस जिगर में, मुस्कराहट क्यों हैं
ख़्वाब की राख से उठता, धुवां क्यों हैं
‘धीर’ अब ज़िन्दगी कंधों से संभालती ही नहीं
आरजू मौत की करता हूँ, जो मिलती ही नहीं
मेरे जीवन में बहार आती ही नहीं

(26.08.1979)

2 अक्टूबर 2008

आज हो जो सहर......

आज हो जो सहर, मुझसे वादा करो
आओगे तुम सनम जान पर खेल कर
रूठने जो लगे मौत मुझसे सनम
इक नज़र देख लेना मुलाक़ात में
आज हो जो सहर.....

उसके हंसने से बिजली चमकने लगी
जैसे साकी से बोतल खनकने लगी
उसने खोली जो जुल्फे घटा थम गयी
इस कदर थी हंसीं फूल शर्मा गए
इक नज़र देख लेना......

याद तुमको अगर आज आए मेरी
आँख से बह पड़े आंसुओं की झड़ी
हम यह समझेंगे जन्नत हमें मिल गया
छोड़ सकते नहीं तेरा दामन सनम
इक नज़र देख लेना......

जब से देखा तुम्हें दिल यह कहने लगा
अब ना थामेंगे दामन किसी और का
मौत मेरी हुयी रुसवा हम ही हुए
देख अब तो नहीं तुमको मुझसे गिला
इक नज़र देख लेना......

बुजदिल है अहबाब…

अंधेरों के झुके हुए साए है साथ-साथ
दूर बहुत झुरमुटों में खो गए हैं अफताब

मायूस हो रहे हैं कई और हमसफ़र
इस तरह चल सकेगा, भला कौन साथ-साथ
न अज़्म है, न शौक़ है, क्या खूब तू बशर
एक बुत है, खामोश है, बुजदिल है अहबाब
दूर बहुत झुरमुटों में खो गए हैं अफताब

मंजिल दिखा-दिखा के मुझे लूटते रहे
लुटता रहा नशे में की लुट रहें हैं साथ-साथ
ये ग़म, ये हवादिस, इन्हीं से जूझते रहे
है शब् भी, शराब भी, मजबूर है शबाब
दूर बहुत झुरमुटों में खो गए हैं अफताब

अंधेरों के झुके हुए साए है साथ-साथ
दूर बहुत झुरमुटों में खो गए हैं अफताब

शमा रोशन रहे.....


शमा ना थरथराये, शमा रोशन रहे
और भी सजती रहे महफिल, शाम ढलती रहे
आज की हर नज़्म में शामिल आप हों
अभी तो जी लें, न जाने कब यह बात हो
तेरे होठों से निकले अल्फाज़ हम चूम ही लेंगे
होठों से निकला हर गीत हमारा होगा
धड़कने दे दिल की धड़कन को इस तरह
हर बार तेरा नाम ही लेता रहूँ मैं

29 सितंबर 2008

कदम लड़खडाने लगे……

क्या इशारा किया आज नज़रों ने तेरी
कदम लड़खडाने लगे
होश आने लगा था मुझे आज लेकिन
कदम लड़खडाने लगे

गुनगुनाते हुए अंजुमन हमने देखे
बहारों में हँसते चमन हमने देखे

यह गुमाँ हमको था फिर खुशी मिल सकेगी
अजब था नशा आज तेरी अदा में
कदम डगमगाने लागे

बहुत चोट खाए बशर हमने देखे
चांदनी में सुलगते मकाँ हमने देखे

यह यकीं था हमें मौत अब तो मिलेगी
इसी अज्म से हम चले जा रहे थे
कदम ज़ख्म खाने लगे

18 जुलाई 2008

…….हमसफर कोई और है

हसरतें कुछ और अपनी, मंजिलें कुछ और हैं
काफिले कुछ और होंगे, हमसफर कोई और हैं

रात भर भटका करेंगे, साए में फानूस के
शम्मा तो जलती ही है, पर यह अंधेरे और हैं

यूँ तो हंसते ही रहे हैं, सुनके अपनी दांस्ता
छोड़ दे अपने निशाँ जो, वह तबस्सुम और हैं

उनकी जुल्फों के तले, सोया बहुत मैं रात भर
छाँव ठंडी बन सके जो, वह घटा कुछ और हैं

हमने खोए होश पी के, जाम अश्कों के कई
बिन पिए जो लड़खडाए, वह कदम कुछ और हैं

हमने काँटे ही चुने, थे गुल बहुत से राह में
फूल बन महका करें जो, ख़ार वह कुछ और हैं

वह लुटेरों का शहर था, मैं जहाँ लूटा गया
ख़ुद बिका हूँ मै जहाँ पर, वह शहर कुछ और हैं

वह दरख्त आज टूटा

मेरी हसरतों ने मुझको, तनहाइयों में लूटा
जहाँ सो गए थे थक कर, वह दरख्त आज टूटा

वह शाम हो कहाँ पर, जिसको सहर के आँसू
किसी आँख से चुराकर, कोई रंग देंगे झूठा
किसी ख्वाब में सहर के, बिखरे हुए थे गेसू
यह अंजुमन हमारा, आहट से उनकी टूटा

जहाँ सो गए थे थक कर, वह दरख्त आज टूटा

मेरी हर खुशी को तुमने, शोलों पे रख के पूछा
नहीं आग है यह कोई, यह धुआं उठा है झूठा
वह रेत के महल थे, जिन्हें हमने बज्म समझा
लो चल दिया संभालो, मेरा अजम आज टूटा

जहाँ सो गए थे थक कर, वह दरख्त आज टूटा

यह अब्र हैं क़हर के, हो सके तो लौट आओ
किसी मोड़ पर न कहना, क्यों साथ अपना छूटा
वह सामने शहर है, अब मुझे न आजमाओ
तुम वह बशर हो जिसने, मंजिल पे मेरी लूटा

जहाँ सो गए थे थक कर, वह दरख्त आज टूटा

चला था मुसाफिर

चला था मुसाफिर इस इरादे को लेकर,
कोई हो ना हो साथ कांटे तो होंगे।
अगर छाँव जुल्फों की ना मिल सकी तो,
सुलगते दहकते शरारे तो होंगे॥

यह कैसा शहर है जहाँ ग़म ही ग़म हैं,
तबस्सुम की मैय्यत से उड़ते कफ़न हैं।
नहीं दूर तक कोई रोशन शमा है,
लरजते अंधेरों में हंसते बशर हैं॥

चला था मुसाफिर इस इरादे को लेकर,
कोई हो ना हो साथ कांटे तो होंगे.

पाँव उठते ही मंजिल हँसी आज हमपर,
यह क्या शौक़ है ज़ख्म अपने छुपा ले।
यकीं है की अश्कों में पिघली मुहब्बत,
इसे वस्ल का एक बहाना बनाले॥

चला था मुसाफिर इस इरादे को लेकर,
कोई हो ना हो साथ कांटे तो होंगे.